दिल का आधा हिसाब तुम रख लो
ख़र्च की ये किताब तुम रख लो
एक अरसे से रतजगों में हूँ
नींद मैं ले लूँ ख़्वाब तुम रख लो
तोड़कर रब्त मुझ को कर दो रिहा
आप अपना जवाब तुम रख लो
लब ये काफ़ी हैं मयकशी के लिए
साक़िया ये शराब तुम रख लो
दौलत-ए-इश्क़ बस मुझे दे दो
बाक़ी हर आब-ओ-ताब तुम रख लो
मेरे हिस्से गुनाह आने दो
और सारे सवाब तुम रख लो
ज़ख़्म मुझ को अज़ीज़ हैं 'रेहान'
ख़ार दे दो गुलाब तुम रख लो
— REHAN KHAN















