जो लोग धूप में थे वो शजर में आ बैठे

हवा बदलते ही कितने हुनर में आ बैठे

वो जिन को फ़िक्र न थी कल तलक ग़रीबों की
चुनाव आते ही सब की नज़र में आ बैठे

किसी ने पूछ लिया हाल आँख भर आई
हम अपने दर्द लिए किस नगर में आ बैठे

अजीब दौर है सच बोलना भी मुश्किल है
ज़रा सी बात थी लेकिन ख़बर में आ बैठे

निकल के आए थे हम अपना घर बनाने को
मगर किराए के ही एक घर में आ बैठे

जो आइने थे कभी अब धुआँ दिखाते हैं
हम अपने सच से निकलते ही डर में आ बैठे

हुनर भी बिकने लगा है यहाँ सियासत में
जो क़द्रदान थे वो भी सफ़र में आ बैठे

अजब मिज़ाज है शहरों का इन दिनों 'रेहान'
यहाँ फ़रिश्ते भी शक की नज़र में आ बैठे

— REHAN KHAN

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