मैं मुश्किलों की कलाई मरोड़ आया हूँ
तमाम झूठ के रिश्तों को तोड़ आया हूँ
मैं ज़िन्दगी की परेशानियों से हारा हुआ
मैं मुश्किलात में वालिद को छोड़ आया हूँ
रहे उजाला तेरी रहगुज़र में इस ख़ातिर
दिया जला के तेरी रह में छोड़ आया हूँ
बलाएँ घेर चुकी थीं मुझे बहुत सारी
दुआ थी माँ की जो उन को झिंझोड़ आया हूँ
हदें थी तेरे मेरे दरमियान जितनी भी
मैं आज उन हदों को ख़ुद ही तोड़ आया हूँ
— REHAN KHAN















