तुझ को सोचूँ तो जहाँ मिस्ल-ए-धुआँ हो जाए
जैसे ग़ालिब यूँ ख़यालों पे गुमाँ हो जाए
तेरे वादे की हक़ीक़त जो अयाँ हो जाए
मेरे सीने में फिर इक ज़ख़्म जवाँ हो जाए
मेरे सज्दों में दुआ तक नहीं बाक़ी अब तो
न कोई बात भी ऐसी जो फ़ुगाँ हो जाए
ज़िन्दगी मौत से हारी है मगर फिर भी ये
हर घड़ी अपनी ही वहशत का निशाँ हो जाए
तू ने मरने की दुआ दी है मुझे यार मिरे
काश पूरा ये तेरा लफ़्ज़-ए-ज़बाँ हो जाए
अब तो हर दर्द मिरे साथ ही चलता है यहाँ
कोई भी याद कभी शाम-ए-गिराँ हो जाए
— REHAN KHAN















