न उजलत ज़िंदगी में और न ही हसरत हुई मुझ सेे
न उस को बे-वफ़ा बोला न ही इज़्ज़त हुई मुझ से
मुझे तो प्यार दुश्मन भी किया करते थे तुम ने क्यूँ
रवाना कर दिया दिल से ये क्या दिक़्क़त हुई मुझ से
मैं जब घर छोड़ कर आ ही गया हूँ पास जो तेरे
तुझे तो प्यार होना था तुझे नफ़रत हुई मुझ से
मैं हूँ नाकाम लड़का और फिर नाकाम भी इतना
न मैं ने नौकरी पाई न वो सहमत हुई मुझ से
सुना है दूर तक देखा बिछड़ते वक़्त उस ने पर
उसे आवाज़ दे रोकूँ नहीं हिम्मत हुई मुझ से
— Rudransh Trigunayat















