आप को रहना है ज़िंदा झूठ की बुनियाद पर
मौत या फिर क़ैद होगी कह दिया जो सच अगर
सोच कर रखना क़दम ये राह कितनी है कठिन
आज कितने सत्यवादी फिर रहे हैं दर-ब-दर
आप को सुननी हैं ख़बरें गर जो ताज़ा आज की
शर्त पहली ये रहेगी सच से रहना बे-ख़बर
आज है जो ग़म तो क्या होगी यक़ीनन कल ख़ुशी
रात जितनी हो अँधेरी किन्तु होती है सहर
किस भरोसे तुम चले थे कौन है वो हम-नशीं
तुम को मंज़िल पर है जाना ख़ुद को कर लो हम-सफ़र
बोल जितने भी कहे हैं आप के माँ-बाप ने
काम आएँगे बहुत रख लो ये गाँठें बाँध कर
— Rupesh Rahi















