हुआ है आज क्या घर में हर इक सामान बिखरा है
उधर ख़ुश्बू पड़ी है और इधर गुलदान बिखरा है
मुहब्बत क्या है ये जाना मगर जाना ये मरकर ही
लिपटकर वो कफ़न से किस तरह बेजान बिखरा है
यहीं मैं दफ़्न हूँ आ और उठाकर देख ले मिट्टी
मेरी पहचान बिखरी है मेरा अरमान बिखरा है
मुझे रुस्वाइयों का ग़म नहीं ग़म है तो ये ग़म है
लबों पर बे-ज़ुबानों के तेरा एहसान बिखरा है
ग़ज़ल के वास्ते मैं फिर नई पोशाक लाया हूँ
अलग ये बात पुर्ज़ों में मेरा दीवान बिखरा है
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