hua hai aaj kya ghar men har ik samaan bikhra hai | हुआ है आज क्या घर में हर इक सामान बिखरा है

  - Saarthi Baidyanath

हुआ है आज क्या घर में हर इक सामान बिखरा है
उधर ख़ुश्बू पड़ी है और इधर गुलदान बिखरा है

मुहब्बत क्या है ये जाना मगर जाना ये मरकर ही
लिपटकर वो कफ़न से किस तरह बेजान बिखरा है

यहीं मैं दफ़्न हूँ आ और उठाकर देख ले मिट्टी
मेरी पहचान बिखरी है मेरा अरमान बिखरा है

मुझे रुस्वाइयों का ग़म नहीं ग़म है तो ये ग़म है
लबों पर बे-ज़ुबानों के तेरा एहसान बिखरा है

ग़ज़ल के वास्ते मैं फिर नई पोशाक लाया हूँ
अलग ये बात पुर्ज़ों में मेरा दीवान बिखरा है

  - Saarthi Baidyanath

Gulshan Shayari

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