ज़िन्दगी तुझ सेे शिकायत क्या करूँँ
मुस्कुराने की है आदत क्या करूँ
चाँद सा महबूब मेरे पास है
मैं सितारों से मोहब्बत क्या करूँ
आख़िरी अंजाम सब को है पता
रौशनी तेरी हिफ़ाज़त क्या करूँ
जाएगी अब इस ज़ईफ़ी में कहाँ
शा'इरी की ये बुरी लत क्या करूँ
दफ़्न कर दूँ या जला दूँ बोलिए
'सारथी' का आख़िरी ख़त क्या करूँ
— Saarthi Baidyanath















