शाइ'र का दुख

खुले सब ज़ख़्म मुझ को रो रो कर आवाज़ देते हैं
चले आओ कि तुम तुम को बहुत आवाज़ देते हैं
मिरी तन्हाई में मुझ को सहारा देते थे वो अब
शजर सब कट रहें हैं पर तुम्हें आवाज़ देते हैं

बड़े दिन बा'द ये दिन आज मेरे पास आया है
मिरा इक दोस्त बे मतलब ही मुझ से मिलने आया है
ये सब कुछ छोड़ मैं तुझ को कहानी इक सुनाता हूँ
तुझे मैं आज दिल की बात खुल कर के सुनाता हूँ

मैं तन्हा रोज़ ख़ुद से बस यही इक बात कहता हूँ
जुदा सब क्यूँ हो जाते हैं जिन्हें मैं अपना कहता हूँ
मैं वो हूँ ग़म भी जिस के साथ अपना रोना रोते हैं
मिरे इस ग़म को सुन कर साथ में दुश्मन भी रोते हैं

मैं तो वो ज़ख़्म हूँ जो रोज़ ही बस खुरचे जाते हैं
तिरी ही याद में मरते हैं बस फिर मर ही जाते हैं
हक़ीक़त में किसी पर कोई भी इतना नहीं मरता
ज़रा सा सब्र कर कोई मुहब्बत में नहीं मरता

मैं भटका इक मुसाफ़िर हूँ भटकता फिर रहा कब से
मैं वो दरिया किनारे को तरसता फिर रहा कब से
ज़रा सी बात पर ये दिल उदासी में खो जाता है
मिरा तू हो भी सकता है ये कहदे क्या ही जाता है
यहाँ पर रोज़ पंछी छोड़ कर घर अपना जाते हैं
यहाँ दिल के सताए लोग बस पागल हो जाते हैं

मैं तो वो हूँ दिए भी क़ब्र पर जिस के नहीं होते
मिरे दुश्मन तो होते हैं मिरे अपने नहीं होते
बता वो कौन है जिस ने मिरा ये हाल जाना है
मिरा दम रोज़ घुटता है किसी दिन घुट ही जाना है

यही इक बात सीने में दबाए जा रहा हूँ मैं
मैं ख़ुद को खा रहा अंदर से ख़ुद को खा रहा हूँ मैं
मिरे ज़ख़्मों की क्या कोई दवा मरहम मिरी होगी
बता तू रास्ता जिस से उदासी कम मिरी होगी

तिरी ज़ुल्फ़ों के ये साए हमारा दिल छुएँगे कब
तिरी आग़ोश में कब होंगे हम तुझ को छुएँगे कब

मैं वो वीरान जो होने को होता था कभी घर भी
मिरे आँगन में बच्चों का लगा रहता था मज़मा भी
यहाँ अब कौन कहने पर किसी का अपना होता है
मगर ये सच है शाइ'र का भला कब कौन होता है

— Sagar Sahab Badayuni

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