मुझ सेे कहती कि ये इश्क़ क्या होता है
मैं उसे कहता हूँ इक नशा होता है
या तो हर शख़्स इस
में फ़ना होता है
या किसी के लिए बस जुआ होता है
दर्द जो अपने ही हमनवा से मिले
उस
में भी दर्द ये अच्छा सा होता है
जितनी ही बार होता रहे इश्क़ पर
हर जवाँ के लिए कुछ नया होता है
प्यास और भूख इस के लिए कुछ नहीं
ये ख़ुदा से न कम पर बड़ा होता है
कितनी साँसें थमी हैं 'अनुज' इश्क़ में
क्यूँ किसी से ये आख़िर जुदा होता है
— sahllucknowi















