"फ़ासला"
तुम्हारे इश्क़ ने बीमार कर दिया है मुझे
है कितनी फ़िक्र मिरे जिस्म की पता है मुझे
तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत कभी मिली ही नहीं
तिरा ख़याल भी सब से अलग दिखा है मुझे
मकाँ-ए-दिल में तिरा इंतिज़ार रहता है
मैं जैसा सोचता हूँ क्या तू सोचता है मुझे
जहाँ भी देखता हूँ तेरा ही तसव्वुर है
तिरी नज़र ने अँधेरे में भी छुआ है मुझे
न सुब्ह मिरी हसीं होती है न रात कभी
मैं ख़ुद को भूल गया हूँ ये क्या हुआ है मुझे
तिरा ख़याल न मिटता न दूर होता है
अजीब शख़्स से पाला इधर पड़ा है मुझे
ग़ज़ब सितम हो रहा है यहाँ मिरे दिल पे
ये आइना भी सर-ए-आम कह रहा है मुझे
— sahllucknowi















