कही किसी से न रूदाद-ए-ज़िंदगी मैं ने

गुज़ार देने की शय थी गुज़ार दी मैं ने

मिरी वफ़ा हुई ता'लीम-ए-ख़ुद-सरी तुझ को
तिरी जफ़ा से लिया दर्स-ए-ज़िंदगी मैं ने

हुजूम-ए-यास में बर्बादी-ए-तमन्ना में
सदा-ए-दोस्त सुनी है कभी कभी मैं ने

वुफ़ूर-ए-जोश-ए-परस्तिश ने कर दिया मजबूर
किसी को ढूँढ़ लिया बहर-ए-बंदगी मैं ने

कभी यक़ीं तो बुतों को ख़ुदा बना डाला
कभी गुमाँ तो ख़ुदा की नहीं सुनी मैं ने

गुमाँ तो नज़्र-ए-ख़िरद काएनात कर डाली
यक़ीं तो वक़्त की रफ़्तार रोक ली मैं ने

गिराँ नहीं है ये सौदा कि दोस्ती में तिरी
ख़रीद ली है ज़माने की दुश्मनी मैं ने

— Salik Lakhnavi

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