मिलेंगे राह में सहरा बहुत बहुत गुलशन

ये देखना है कहाँ रोकती है अपनी थकन

चले चलो कि है आरास्ता रह-ए-मंज़िल
कहीं है दार ब-क़द्र-ए-जुनूँ कहीं है रसन

रह-ए-हयात में इक रंग में थे कितने रंग
उलझ के रह गया दिल की निगाह का दामन

थी गुल-मिसाल मिरी गुफ़्तुगू तिरे रुख़ से
चुरा लिया तिरे होंटों से मैं ने रंग-ए-सुख़न

कहाँ कहाँ न जली तेरी याद की क़िंदील
कहाँ कहाँ न हुई दिल की जुस्तुजू रौशन

— Salik Lakhnavi

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