आख़िरत ही नहीं दुनिया को मना रक्खा है
उस ने आमाल से किरदार सजा रक्खा है
हाथ और पाँव में काला सा वो धागा पहने
हर किसी शख़्स की आँखों को लुभा रक्खा है
इस तरह लम्हों को आँखों में समेटा है 'समर'
जैसे दरिया को निगाहों में बसा रक्खा है
— salman khan "samar"















