अपने दिल को ही मैं दीवार किए देता हूँ
क्यूँ तिरी याद को बीमार किए देता हूँ
मैं ज़माने से तिरे हक़ के लिए लड़ कर के
अपनी दुनिया को गुनहगार किए देता हूँ
मुझ पे इल्ज़ाम लगाते हैं ज़माने वाले
मैं तिरे हुक्म से इनकार किए देता हूँ
दूरियाँ रखना सदा इश्क़ के इन मसअलों से
मैं 'समर' तुझ को ख़बरदार किए देता हूँ
— salman khan "samar"















