जिस्म में ज़िंदगी कसमसाने लगी
देखते देखते जान जाने लगी
वस्ल की छाँव में लहलहाती थी जो
हिज्र की धूप उस को जलाने लगी
लब सिले ही रहे मस्लिहत में जहाँ
आँख मेरी वहाँ डुब डुबाने लगी
मुझ से लिपटे थे यादों के जाले तेरे
धीरे धीरे जिन्हें मैं हटाने लगी
बेबसी से भी है ये बड़ी बेबसी
नाम लिख लिख के तेरा मिटाने लगी
कैफ़ियत दिल की सब से छुपाई है यूँ
भीगी पलकें तो मैं मुस्कराने लगी
नाख़ुदा ने भी छोड़ा है मुझ को वहाँ
मेरी कश्ती जहाँ डगमगाने लगी
हो गए सब परीशाँ मेरी ज़ात से
ज़िन्दगी क्यूँ बुरे दिन दिखाने लगी
बे-असर हो गई जब वज़ाहत सना
ख़ामुशी साथ तब से निभाने लगी
— Sana Hashmi















