वो नज़रों में फिर से समाने लगे हैं
जो हम से ही नज़रें चुराने लगे हैं
दिए ज़ब्त के वो बुझाने लगे हैं
मेरा ज़र्फ़ वो आज़माने लगे हैं
जिसे हिज्र की आँधियों ने उजाड़ा
घरौंदा वही फिर बनाने लगे हैं
कभी वस्ल की आरज़ू थी सताती
कि मंज़र वही याद आने लगे हैं
रही ख़ूब वाक़िफ़ छलावों से जिन के
वही दिल में फिर क्यूँ समाने लगे हैं
भिगा ही दिया अश्क की बारिशों ने
मुहब्बत के फिर अब्र छाने लगे हैं
वही सर्द रातें ये बारिश की बूँदें
ये मौसम मुझे ही सताने लगे हैं
उमीद-ए-वफ़ा क्या करें हम किसी से
यही बात दिल को बताने लगे हैं
न छेड़ो मुहब्बत के क़िस्से को यारों
जिसे ख़ुद से अब हम दबाने लगे हैं
ग़मों को छुपाया जहाँ से 'सना' ने
सभी ज़ख़्म नज़रों में आने लगे हैं















