अब तू मेरे निशाने पर भी है

फिर ये दिल आज़माने पर भी है

बैठा हूँ कब से मैं किनारे पर
अब ये दरिया डुबाने पर भी है

जा चुकी जो रक़ीब के जानिब
याद उस की फिर आने पर भी है

रोना दस्तूर है मुहब्बत में
इश्क़ ज़ालिम रुलाने पर भी है

क्या कहूँ यार मिलने का उन से
गांव वापस जो जाने पर भी है

और कई क़िस्से है मुहब्बत के
दिल नया कुछ सुनाने पर भी है

मय-कशी शौक़ है नवाबों का
आज काफ़िर पिलाने पर भी है

खेल अच्छी रहे "शफ़क़" बाजी
जीत अब दम लगाने पर भी है

— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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