कोई हदस ज़्यादा तो कोई हद में बदलेगा
देखो तो हर कोई दशहत की ज़द में बदलेगा
मज़हब पर लड़ने वालों होश में आ जाओ वरना
छोटा-मोटा झगड़ा इक दिन सरहद में बदलेगा
करते फिरते हो मुख़्तारी जिसकी तुम रोज यहाँ
तुम यार भरम में हो कि तुम्हें वो पद में बदलेगा
कि बदल कर ग़ैर बनाएगा वो ही सब सेे पहले
जो लगता है तुमको वो इंसाँ शायद बलदेगा
ये ज़ख़्म सभी नासूर यहाँ बन जायेंगे इक दिन
जब पतझड़ के मौसम में पत्ते बरगद बदलेगा
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