मेरे महबूब के क़रीब बहुत
शहर में हैं भरे रक़ीब बहुत
है ज़रूरत नहीं मुझे अदू की
याँ हैं साहब मिरे हबीब बहुत
मुद्दों की नेता क्यूँ करें चिंता
उस लिए हैं यहाँ ग़रीब बहुत
मर गए वो कमी से उनकी जो
कहते थे हैं मियाँ तबीब बहुत
बहर में क्यूँ नहीं अभी ग़ज़लें
पास मेरे तो हैं अदीब बहुत
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