कभी दरिया खँगाले तो कभी सहरा में जा बैठी
तुम्हारी याद में ये बावली दुनिया भुला बैठी
भला कैसे मुकम्मल होती मेरी आशिक़ी यारों
जब इक शादीशुदास ही मैं अपना दिल लगा बैठी
मुझे हर पाई पाई ज़िंदगी की तब समझ आई
मैं दिल की दौलतें उस बेवफ़ा पर जब लुटा बैठी
मुहब्बत बाँध दी देहरी पे दीपक रख दिए अंदर
तेरे आने का वा'दा था तो सारा घर सजा बैठी
मिरे श्री राम आए हैं मिरे श्री राम आए हैं
ये मिसरा कह के मैं अपनी ग़ज़ल पावन बना बैठी
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