मौत को माना ख़ुदा बेचारगी से मर गए
शम्अ'' में परवाने कितनी सादगी से मर गए
साहिलों की रेत से पूछो हमारा सानिहा
कैसे हम दरिया किनारे तिश्नगी से मर गए
कुछ के हिस्से मौत आई कुछ ने कर ली ख़ुद-कुशी
और जो भी रह गए वो ज़िन्दगी से मर गए
फिर से कितने सरकशों ने आख़िरी साँसें भरीं
आज फिर कितने सितारे तीरगी से मर गए
इतने ख़ुश-क़िस्मत कहाँ थे हम कि मरते रंज से
क़ातिलों से की मुहब्बत दिल-लगी से मर गए
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