है ज़िन्दगी जीनी मगर जीने का कोई जी नहीं
सब को दिखे हँसना मिरा पर आँख का पानी नहीं
यूँ इस तरह ग़मगीन रहने की थी मेरी क्या वजह
उस ने कभी पूछी नहीं मैं ने बताई भी नहीं
ख़ामोशियाँ बढ़ती गई सो दूरियाँ बढ़ती गई
सब कुछ सुलझ सकता था फिर क्यूँ बात हम ने की नहीं
बस करवटे लेते रहे हम सो न पाए एक पल
वो रात छोटी थी मगर वो रात छोटी थी नहीं
था तन कहीं पे और उस का मन कहीं पे और ही
वो पास में ही थी मगर वो पास में थी ही नहीं
— Sarvjeet Singh















