"ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे"
सफ़ीना मेरी डगमगा रही है
इक ऊँची सी लहर मेरी ओर आ रही है
ये जल है जो तेरा मुझे डाले है घेरा
चिढ़ाता है कह कर बे-चारा मुझे
ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे
कब से सफ़र में हूँ मैं तेरे साथ में
जहाँ हूँ सुब्ह हूँ वहीं रात में
चारों तरफ़ है इक गहरा सन्नाटा
क्यूँ लाया तू मुझ को इस हालात में
गर मुझ से है तुझ को थोड़ी भी मोहब्बत
तो जाऊँ कहाँ कर इशारा मुझे
ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे
तू ने मुझे बहुत कुछ है सिखाया
मैं भटका हुआ था मुझे ख़ुदस मिलाया
भूलूँगा नहीं मैं वो हर एक पल जो
मैं ने इस सफ़र में है तुझ संग बिताया
मैं चाहता नहीं हूँ मगर जाना होगा
है ज़मीं से किसी ने पुकारा मुझे
ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे















