zabt karne men hai samajhdari | ज़ब्त करने में है समझदारी

  - Sayeed Khan

ज़ब्त करने में है समझदारी
और कुछ बोलना है मक्कारी

इतना ज़्यादा रहा हूँ मैं बीमार
की मेरी मौत से भी है यारी

ये दवा ये दुआ के हैं असरात
साँस लेना भी जिस सेे है भारी

काम मुश्किल बहुत है ये करना
सब सेे खु़श रहने की अदाकारी

एक तेरे सिवा मेरा है कौन
किस की है और दिल पे सरदारी

अब जियोगे सईद कैसे तुम
हिज्र और उस पर एक बीमारी

  - Sayeed Khan

Hijr Shayari

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