तेरा छाया हुआ है नूर दिल पर
तो क्यूँकर हों न हम मग़रूर दिल पर
वहीं से मैं सदा देता हूँ उस को
उठा रक्खा है मैं ने तूर दिल पर
परी चेहरों की मौला ख़ैर होवे
अभी तारी है शौक़-ए-हूर दिल पर
थकन सब को सुला देती है लेकिन
तअज्जुब है मेरे मज़दूर दिल पर
जिन्हें हम घाव कह कर हँस रहे थे
हँसी से हो गए नासूर दिल पर
गुनाहों क्या बनेगा इस का आख़िर
तरस खाओ मेरे मजबूर दिल पर
— Shadab Javed















