मैं रात उठूँ और अपने सारे

पुराने यारों को फ़ोन कर के
उन्हें जगाऊँ
उन्हें जगाऊँ
उन्हें बताऊँ
कि यार तुम सब बदल गए हो
बहुत ही आगे निकल गए हो
जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं
वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली
जो रातें तुम ने पसंद की हैं
वो सख़्त काली हैं सख़्त काली
ज़रा सा माज़ी बईद देखो
हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे
जहाँ पे हम से अगर हमारा
कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो
हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर
निकालते थे
हँसी की बातें,
अजीब क़िस्से,
अजीब सस्ते से जोक कह के
किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे
उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे
और आज आलम है ऐसा हम सब
ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं
हमारी लाइफ़ में कोई लड़की
हमारी लाइफ़ बनी हुई है
हमारी आँखों पे प्यार नामक
सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है
तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो
किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो
उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो
ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ
जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ
मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है
किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है
सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर
पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे
किसी का नंबर लगाऊँ कैसे
मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ
मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

— Shadab Javed

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