kuchh der kaali raat ke pahluu men late ke | कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के

  - Shahid Kabir

कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के
लाया हूँ अपने हाथों में जुगनू समेट के

दो चार दाँव खेल के वो सर्द पड़ गया
अब क्या करोगे ताश के पत्तों को फेट के

उस साँवले से जिस्म को देखा ही था कि बस
घुलने लगे ज़बाँ पे मज़े चाकलेट के

जैसे कोई लिबास न हो उस के जिस्म पर
यूँँ रास्ता चले है बदन को समेट के

मैं उस के इंतिज़ार में बैठा ही रह गया
कपड़ों में रख गया वो बदन को लपेट के

हर फ़लसफ़े को वक़्त ने ऐसे मिटा दिया
जैसे कोई नुक़ूश मिटा दे सलेट के

वो हँस रहा था दूर खड़ा और चंद लोग
ले जा रहे थे उस को कफ़न में लपेट के

  - Shahid Kabir

Intezaar Shayari

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