तेरे संग जो गुज़री वो हसीन गुज़री थी

सच में ये अधूरी भी बेहतरीन गुज़री थी

बे-असर था तब तो ये मेरा सर्द-कुन-आला
वो जो रातें मस्ती में दिल-नशीन गुज़री थी

यूँ बहारें कहती थी ये सदा गुलिस्ताँ की
कल यहाँ से जो तेरी हम-नशीन गुज़री थी

मोतियों सी नूरानी ये चमकती आँखों से
चाँदनी भी उस शब की कमतरीन गुज़री थी

ले के बोसा-ए-आरिज़ ये लबों की लज़्ज़त से
शर्म से भरी चुप्पी यूँ समीन गुज़री थी

मेरी नक़्श-ए-मंज़िल पे तेरी रहनुमाई से
घूमती हुई जैसे ये ज़मीन गुज़री थी

बिन तिरे वो सागर की बहती ये रवानी की
जिस्म छूती ये लहरें बदतरीन गुज़री थी

— Shaikh Arhan

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