कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी
मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी
मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा
ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी
हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उस की मर्ज़ी
मगर सबूतों से छेड़खानी नहीं चलेगी
बड़ों के नक्श-ए-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे
पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी
अगर वो अपनी ज़री की साड़ी पहन के निकली
तो यार लोगों पे शेरवानी नहीं चलेगी
वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की खिदमतें हैं
तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी
बहुत ज़ियादा भी मुत्मइन मत दिखाई देना
बिछड़ते लम्हों में शादवानी नहीं चलेगी
— Shakeel Jamali















