ख़याल-ए-यार में गुम हूँ जहाँ से दूर रहता हूँचले आ अब तो जानाँ मैं बहुत मख़मूर रहता हूँवो तेरा ही सहारा था जो पहुँचा मैं बुलंदी परमैं तेरे प्यार को पाकर बहुत मग़रूर रहता हूँ— Shakir Sheikh