तिरी तरफ़ से तो हाँ मान कर ही चलना है
कि सारा खेल इस उम्मीद पर ही चलना है
क़दम ठहर ही गए हैं तिरी गली में तो फिर
यहाँ से कोई दुआ माँग कर ही चलना है
रहे हो साथ तो कुछ वक़्त और दे दो हमें
यहाँ से लौट के बस अब तो घर ही चलना है
मुख़ालिफ़त पे हवाओं की क्यूँ परेशाँ हों
तुम्हारी सम्त अगर उम्र भर ही चलना है
कोई उमीद नहीं खिड़कियों को बंद करो
कि अब तो दश्त-ए-बला का सफ़र ही चलना है
ज़रा सा क़ुर्ब मुयस्सर तो आए उस का मुझे
कि उस के बा'द ज़बाँ का हुनर ही चलना है
— Shariq Kaifi















