जाम वो होठ से लगाते हैं
ग़म से जो राब्ता निभाते हैं
हम तो वो टूटे दिल के शाइ'र हैं
शा'इरी में सुने जो जाते हैं
बात ईमानदारी की है अब
हम न खाते न ही खिलाते हैं
आज वीरान है पड़ी मस्जिद
ये नमाज़ी कहाँ को जाते हैं
अब रक़ीबों में चर्चे हैं काफ़ी
आप के घर हकीम आते हैं
छोड़ कैसे मैं देता सिगरेट को
वो कहें आज हम पिलाते हैं
कर ली है हम ने भी मुहब्बत अब
लोग पागल हमें बताते हैं
— Sahir banarasi















