इन अँधेरों की आशिक़ी मुझ सेे
छीन लेगी ये रौशनी मुझ से
बंद की अपनी आँख तब जा कर
उस की बंद-ए-क़बा खुली मुझ से
मीर जी हँस के बात करती है
पंखुड़ी इक गुलाब सी मुझ से
लोग इतने मरे मेरे अंदर
लाश गिनते नहीं बनी मुझ से
राम कह कर के बात करती है
ख़्वाब में मेरी जानकी मुझ से
होंगे शाइ'र बहुत मगर दर्पन
जानी जाएगी ये सदी मुझ से
— shashwat singh darpan















