दिल मेरा मुझ सेे ही बाहर कर दिया है
तू ने कैसा जादू-मंतर कर दिया है
इक बड़े से घर की चाहत ने मुझे यार
एक अच्छे घर से बेघर कर दिया है
तेरे जाने पे भी अब रोऊँ न शायद
तू ने मुझ को इतना पत्थर कर दिया है
क्या बताऊँ हाल क्या है, दिल ने मेरे
रो रो के आँखों को समुंदर कर दिया है
शे'र मुझ को फिर से ये पड़ना ही होगा
यार उस ने अब जो मुकर्रर कर दिया है
— karan singh rajput















