हुनर कुछ ऐसा भी कर जाएँ क्याकि टूट कर यहीं बिखर जाएँ क्यातुम बिछड़ कर भी ख़ुश नहीं हो मुझ सेतुम्हारी ख़ातिर अब मर जाएँ क्या— karan singh rajput