इतना भी इनको तू बेदाद नहीं कर सकता
ज़ुल्म इतना कभी सय्याद नहीं कर सकता
हम ही करते रहें क्या याद तुझे शब-भर शब
ख़ुद कभी क्या तू हमें याद नहीं कर सकता
ये सभी ज़ख़्म विरासत में मिले हैं मुझ को
मुझ को इस दर्द से आज़ाद नहीं कर सकता
ख़ुद ही ख़ुद को मिटा सकता हूँ मैं ऐसे कोई
शख़्स कर दे मुझे बर्बाद नहीं कर सकता
देख कर हाल बता सकता हूँ वो लड़की है
काम ये कोई भी जल्लाद नहीं कर सकता
मौत चुंगल है चले जाएँगे जिस
में हम सब
भीख बस माँग ले फ़रियाद नहीं कर सकता
रूह को लिखता है ग़ज़लों में डुबा कर सागर
दौर का कोई भी ये उस्ताद नहीं कर सकता
— Shivam Raahi Badayuni















