हो गई है दूर इतनी आदमी से ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ही माँगती है ज़िन्दगी से ज़िन्दगी
ख़ुद चराग़ों को बुझाकर सोचता हूँ बेवजह
क्यूँ ख़फ़ा है यार मेरी रौशनी से ज़िन्दगी
गर मुयस्सर यार होता बाँट लेता ग़म सभी
चल रही है पर अभी बस शा'इरी से ज़िन्दगी
वक़्त की पाबंद है वो वक़्त पर ही आएगी
क्यूँ लड़ाते फिर रहे हो ख़ुद-कुशी से ज़िन्दगी
खेल है तो खेल के जैसे ही खेलो दोस्तो
फ़िक्र छोड़ो और जी लो दिलकशी से ज़िन्दगी
— Shivam Rathore















