जीने का क्या ज़रा सा रवैया बदल लिया
लोगों ने बोलने का सलीक़ा बदल लिया
कब तक मैं रोक पाता मुसलसल बहाव को
इक रोज़ फिर नदी ने ही रस्ता बदल लिया
पाले में जब थी जीत मेरे साथ सब रहे
जब हारने लगा मैं तो पाला बदल लिया
इक तीर प्यार का मेरे तरकश में देख कर
दुश्मन ने दुश्मनी का इरादा बदल लिया
क़ायम है दाग़ रूह के कुछ भी नहीं मिटा
क्या फ़ायदा है तू ने जो शीशा बदल लिया
— Shivam Rathore















