राजा भी चल दिया कोई प्यादा नहीं रहा
हर फूल सूख कर गिरा ताज़ा नहीं रहा
होती है धूप क्या ये जरा उन से पूछना
जिन के सरों पे बाप का साया नहीं रहा
बेटों को अपनी माँ की कोई फ़िक्र ही नहीं
हामिद कहाँ है अब कोई चिमटा नहीं रहा
बस जिस्म का नशा था मुहब्बत के नाम पर
दो चार दिन असर रहा ज़्यादा नहीं रहा
ता'उम्र प्यास ले के जिसे ढूँढ़ता रहा
आख़िर पता चला कि वो दरिया नहीं रहा
— Shivam Rathore















