जाओ मोहब्बतों के मकीं इस मकान से
ख़र्चा नहीं निकल रहा अहद-ए-ज़ुबान से
कश्ती जो डूबने को है अपनी थकान से
आख़िर तलक वो लड़ रही थी ख़ानदान से
इस शाख़ पे जो फूल थे जादूगरी से क़ब्ल
कुछ तितलियाँ वो ले उड़ीं तेरे बयान से
जिस तरह मेरे ज़िक्र पे कुछ ढूँढ़ते हो तुम
रुख़्सत नहीं हुआ हूँ अभी दरमियान से
किस तैश में गिरा दिए मैं ने सभी दरख़्त
क्या रात काट लूँगा मैं तीर-ओ-कमान से
— Shubham Nankani















