चांँद यूँँ भी रात को खोने लगा है आजकल
चांँदनी के ख़्वाब को ढ़ोने लगा है आजकल
रात का सपना जो मेरे साथ जगता था कभी
देख हालत जेब की सोने लगा है आजकल
फेंक देता था कभी बेकार कह के वो जिसे
यार उन कपड़ों को वो धोने लगा है आजकल
सारे घर का लाडला रोता नहीं था जो कभी
हाल घर का देख के रोने लगा है आजकल
एक ही तो चीज थी जो यार उस के पास थी
और वो विश्वास भी खोने लगा है आजकल
काम जो होता नहीं था रोज़ के अरदास से
वो भी माँ के हाथ से होने लगा है आजकल
— Shubhangi Bharti















