जभी से दिल निभाने लग पड़ा है
कोई इस को सताने लग पड़ा है
अभी ये देख के हैरत है मुझ को
वो कैसे दूर जाने लग पड़ा है
बसी दुनिया को कैसे तोड़ते हैं
सभी को वो सिखाने लग पड़ा है
मेरा ग़म जो दिखाया था उसे कल
अभी सब को दिखाने लग पड़ा है
मुझे अब मार डालेगा कभी भी
क़सम झूठी वो खाने लग पड़ा है
बताओ भारती मैं क्या करूँंँ अब
मुझे वो फिर मनाने लग पड़ा है
— Shubhangi Bharti















