उतना ही प्यार दीजिए जितने में जी लगे
हदस ज़ियादा रौशनी भी तीरगी लगे
ये कह के दुश्मनों को तसल्ली मैं दे रहा
जिस दिन भी मुझ को हाए लगे आपकी लगे
मेरी नज़र का फेर है या वाक़ई हबीब
हर एक शक्ल आज मुझे दूसरी लगे
दो चार दिन की और है ये जानते हुए
कुछ दिन से मुझको ज़ीस्त मेरी दाइमी लगे
कुछ और करना लकड़ियों को मुश्तइल रक़ीब
गर लाश मेरे 'इश्क़ की कुछ अधजली लगे
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