ये ग़म ख़ुशियों की क्यूँ मुझ पर नज़र होने नहीं देते
मुझे आग़ोश में ले कर सहर होने नहीं देते
बड़ी ख़ामोशी से रहते मिज़ा-ए-दिल पे ये आँसू
किसी को दर्द की मेरे ख़बर होने नहीं देते
शजर पर दिल के बैठे हैं परिंदे हिज्र के कुछ यूँ
कि शाख़ों पर मोहब्बत के समर होने नहीं देते
सजा कर लोग सपने इक हसीं सा घर बनाने के
बना लेते मकाँ पर उस को घर होने नहीं देते
— Dr Bhagyashree Joshi















