लकीर-ए-ज़िन्दगी का रंग हाथों में हिनाई है

हाँ शायद इस लिए ये मौत तुझ को छू न पाई है

निग़ाह-ए-शौक थी तुझ पर ब-मुश्किल से हटाई है
मुख़ालिफ़ सम्त पर चलने की अब हिम्मत जुटाई है

तिजोरी में मोहब्बत की लगा कर ताला चुप्पी का
मुकफ़्फ़ल कर लिया दिल में तुझे चाबी छुपाई है

ख़ुदाया खेल ये तेरा समझ पाया नहीं कोई
मोहब्बत में शब-ए-हिज्रा ही क्यूँ लंबी बनाई है

हटा दी तू ने जब नज़रें, नज़र सदहा उठी मुझ पर
उठी नज़रों के आगे मैं ने फिर नज़रें झुकाई है

गुलाबों की महक़ आती है अब भी इन किताबों से
पढ़ाई तू मेरी, डिग्री भी तू, तू ही कमाई है

— Dr Bhagyashree Joshi

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Ummeed Shayari

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