ख़मोश रहता तो ये काम होने वाला था
जहान-ए-ग़ैब मेरे नाम होने वाला था
पयंबरी की ख़ुमारी में कट गिरा वरना
हरे दरख़्त पे इल्हाम होने वाला था
मैं जल्दबाज़ी में ख़ुद ही उठा के ले आया
मेरे बदन पे अभी काम होने वाला था
फिर एक इश्क़ ने बढ़ कर मुझे सहारा दिया
जब एक इश्क़ में नाकाम होने वाला था
चराग़ जिस तरह लाए गए थे मक़्तल में
किसी का क़त्ल सर-ए-शाम होने वाला था
ज़माने तू भी अजब वक़्त बीच में आया
हमारे इश्क़ का अंज़ाम होने वाला था
पड़ी थी क्या तुझे 'तारिक़ नईम' जाने की
कोई दिनों में तेरा नाम होने वाला था
— Tariq Naeem















