ये ख़सारा कोई नहीं समझे
दुख हमारा कोई नहीं समझे
सिर्फ़ मैं ही तुम्हें समझता हूँ
ये ख़ुदारा कोई नहीं समझे
जिस इशारे में तुम समझती हो
वो इशारा कोई नहीं समझे
जिस का कोई नहीं ख़ुदा उस का
बेसहारा कोई नहीं समझे
सिर्फ़ इस डर से मैं नहीं मिलता
बस तुम्हारा कोई नहीं समझे
सब को अपनी पड़ी हुई है यहाँ
हक़ हमारा कोई नहीं समझे
देख फिर बात करनी पड़ती है
जब इशारा कोई नहीं समझे
है उदासी मेरी शरीक-ए-हयात
ग़म का मारा कोई नहीं समझे
— Tarique Jamal















