मेरी आँख से तेरा ग़म छलक तो नहीं गया

तुझे ढूंढ कर कहीं मैं भटक तो नहीं गया

ये जो इतने प्यार से देखता है तू आजकल
मेरे दोस्त तू कहीं मुझ से थक तो नहीं गया

तेरी बद-दुआ का असर हुआ भी तो फ़ाएदा
मेरे मांद पड़ने से तू चमक तो नहीं गया

बड़ा पुरफरेब है शहदो शिर का ज़ाइका
मगर इन लबों से तेरा नमक तो नहीं गया

तेरे जिस्म से मेरी गुफ्तगू रही रात भर
कहीं मैं नशे में ज़्यादा बक तो नहीं गया

— Tehzeeb Hafi

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