उदासी चाहती है तोड़ना मुझ को
तुम्हारे हाथ में है जोड़ना मुझ को
मोहब्बत चाहती है गर इबादत तो
उसी की दस्तरस में छोड़ना मुझ को
बुझा कर जुगनुओं को बच न पाएगा
है शीशा बल्ब का जो फोड़ना मुझ को
लगी जब शा'इरी उगने जराहत में
तभी से चाहते तुम कोड़ना मुझ को
है राह-ए-इश्क़ फ़ाहिशगी से मुश्किल-तर
तो राह-ए-सख़्त में तुम मोड़ना मुझ को
— Abhishek Baba















